Wednesday, April 13, 2011
लोकतंत्र
विपन्नता, अशिक्षा, गरीबी के बहुतायत वाले राष्ट्र में लोकतान्त्रिक प्रणाली का सुख कुछ चुने हुए प्रतिनिधि और उनके द्वारा नियुक्त नौकरशाह ही उठाते हैं। किसी भी देश में इस प्रणाली को लागु करने के पहले उस देश के लोगों को शिक्षित एवं सम्पन्न बनाने को प्राथमिकता देना चाहिए, अन्यथा अमीर और गरीब के बीच की खाई बदती जाएगी। आज चाइना और हिंदुस्तान की शासन प्रणाली की तुलना की जाये तो चाइना में लोकतंत्र नहीं है लेकिन वंहा के लोग भारत के लोगों से ज्यादा खुशहाल भले ही वंहा विरोध करने का अधिकार नहीं है या मीडिया को आजादी नहीं है लेकिन विश्व की एक शक्ति तो है। हम उस प्रणाली को लागु नहीं करसकते लेकिन कुछ चुने हुए प्रतिनिधि और नोकर्शाहों के आचरण की वजह से लोकतान्त्रिक प्रणाली की अवधारणा को सफल भी नहीं बना सकते। क्या तो अच्छे आचरण वाले लोगों को सत्ता सौंपी जाये उसके लिए सत्ता तक पहुचने की प्रणाली को इतना पारदर्शी बनाया जाये की कोई असामाजिक, भ्रष्ट या गंदे आचरण का व्यक्ति वंहा तक पहुंचे ही नहीं। चुनाव परक्रिया को इतना पारदर्शी या कठोर बनाया जाये की कोई प्रत्याशी वोट के लिए किसी को ललचाये न। या वोटर को इतना जागरूक बनायें की वह किसी के भय या प्रलोभन में न आये। यह तभी संभव होगा जब आम नागरिक शिक्षित और साधन संपन्न होगा। जिस देश की ७०%आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही हो उससे उचित प्रत्यासी के चयन के अपेक्षा कैसे की जा सकती है। देश की इतनी बड़ी आबादी को इतना उपेक्षित रखना इस देश के कर्ण धारों की सोची समझी रणनीति ही समझ आती है। अन्यथा क्या कारन है की हमारे बाद आजाद हुए राष्ट्र हमसे कंही ऊपर हैं। अन्नाहजारे , रामदेवबाबा जैसे लोगों को ग्रामपंचायत से प्रदेश तक तैयार करना होगा। तभी इस देश के कर्णधारों की लुटाई ओर अकर्मण्यता पर अंकुश लग पायेगा।
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