Saturday, May 14, 2011
पांच विधासभावों के चुनाव का परिणाम
१३ मई के परिणाम से देश की अखंडता को खतरा पैदा हो गया है reasional पार्टियों से देश की एक जुटता खडित होगी हर नेता अपने को जिन्दा रखने के लिए केंद्र को दबाएगा ओर सिर्फ अपने reasion को बढ़ने का प्रयास करेगा रास्ट्रीय भावना गौण हो जाएगी
Sunday, May 1, 2011
जन्प्रतिनिधियौं को शाश्कीय सुरक्षा
राजनीति सेवा ka shetra hai इस में भाग लेने वाले लोग अगर चुन कर आते हैं तो येमाना जाता है की ये उस छेत्र के सर्व मान्य प्रतिनिधि है तथा इनका सम्मान भी समाज में होगा तब इन्हें सुरक्छा की जरूरत क्यों अगर ये सुरक्छा के प्रति इतने चिंतित हैं तो राजनीती में नहीं आना चाहिएजो अपनीसुरक्छा नहीं कर सकता वो जनता की क्या सुरक्षा करेगा , इसलिए इनकी तमाम सुरक्षा हटा देनी चाहिए केवल प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री, गवर्नर और राष्ट्रपति को ही ये सुविधा मिलनी चाहिए ।
Saturday, April 16, 2011
जन लोकपाल बिल
आज राजनेतिक पार्टियों में जो इस बिल के बाबत बहस और चिंता जाहिर की जा रही है वो साबित कर रही है की ये बिल इनके लिए मुसीबत बन गया है जो निगलना ओर उगलना दोनों ही मायने में उनके लिए मुसीबत है। परन्तु इस देस का युवा और बुद्धिजीवी जाग गया है की लोकतंत्र में लोक प्रमुख न की तंत्र अब तंत्र जनता चलाएगी न की तंत्र का राज जनता पर।
Wednesday, April 13, 2011
लोकतंत्र
विपन्नता, अशिक्षा, गरीबी के बहुतायत वाले राष्ट्र में लोकतान्त्रिक प्रणाली का सुख कुछ चुने हुए प्रतिनिधि और उनके द्वारा नियुक्त नौकरशाह ही उठाते हैं। किसी भी देश में इस प्रणाली को लागु करने के पहले उस देश के लोगों को शिक्षित एवं सम्पन्न बनाने को प्राथमिकता देना चाहिए, अन्यथा अमीर और गरीब के बीच की खाई बदती जाएगी। आज चाइना और हिंदुस्तान की शासन प्रणाली की तुलना की जाये तो चाइना में लोकतंत्र नहीं है लेकिन वंहा के लोग भारत के लोगों से ज्यादा खुशहाल भले ही वंहा विरोध करने का अधिकार नहीं है या मीडिया को आजादी नहीं है लेकिन विश्व की एक शक्ति तो है। हम उस प्रणाली को लागु नहीं करसकते लेकिन कुछ चुने हुए प्रतिनिधि और नोकर्शाहों के आचरण की वजह से लोकतान्त्रिक प्रणाली की अवधारणा को सफल भी नहीं बना सकते। क्या तो अच्छे आचरण वाले लोगों को सत्ता सौंपी जाये उसके लिए सत्ता तक पहुचने की प्रणाली को इतना पारदर्शी बनाया जाये की कोई असामाजिक, भ्रष्ट या गंदे आचरण का व्यक्ति वंहा तक पहुंचे ही नहीं। चुनाव परक्रिया को इतना पारदर्शी या कठोर बनाया जाये की कोई प्रत्याशी वोट के लिए किसी को ललचाये न। या वोटर को इतना जागरूक बनायें की वह किसी के भय या प्रलोभन में न आये। यह तभी संभव होगा जब आम नागरिक शिक्षित और साधन संपन्न होगा। जिस देश की ७०%आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही हो उससे उचित प्रत्यासी के चयन के अपेक्षा कैसे की जा सकती है। देश की इतनी बड़ी आबादी को इतना उपेक्षित रखना इस देश के कर्ण धारों की सोची समझी रणनीति ही समझ आती है। अन्यथा क्या कारन है की हमारे बाद आजाद हुए राष्ट्र हमसे कंही ऊपर हैं। अन्नाहजारे , रामदेवबाबा जैसे लोगों को ग्रामपंचायत से प्रदेश तक तैयार करना होगा। तभी इस देश के कर्णधारों की लुटाई ओर अकर्मण्यता पर अंकुश लग पायेगा।
Friday, July 16, 2010
फैलिएर ऑफ़ डेमोक्रेसी इन इंडिया
६२ साल बाद भी ५५% जनता डेमोक्रेसी का मतलब नहीं समझ पाई इस देश के नेतृतव की असफलता साबित करती है। नरेगा के पैसे की बंदरबाट किसी भी सरकारी योजना के पैसे की होली और गैरजिम्मेदारान तरीके से उसका दुरूपयोग यही साबित करता है की लोगों में ये भावना ही नहीं है की ये देश हमारा है।
Wednesday, July 7, 2010
भारत में बाढ़
बरसात सुरु होते ही तबाही शुरूहो जाती है ,पंजाब,हरयाणा के अम्बाला,कुरुषेत्र में नहर के टूटने पर पानी का शहरों ,में गांवों में घुस आना नहरों के निर्माण में भ्रस्ताचार का होना साबित करता है। पंजाब के राजस्थान के स्टेशन पर सरकारी राहत का गेहूं पानी में भीगना साबित करता है की शाशकीय वयवस्था कितनी बिगड़ चुकी। इस नुकसान की भरपाई उन अफसरों या क्रमचारियों से करनी होगी जिसकी वजह से ये बर्बादी हुई। केंद्र ओर राज्य की सरकारों द्वारा एक दुसरे पर जवाबदारी का बहाना भी यही साबित करेगा की शासन करने वाले कितने लापरवाह लोग हैं इसलिए बार बार यही कहता हूँ की वयवस्था बदलनी होगी नहीं तो ये देश बर्बाद हो जायेगा अराजकता फ़ैल जाएगी पढ़े लिखे लोग देश छोड़ कर विदेश चले जायेंगे ओर गुंडे,लुटेरे,ही इस देश में वास करेंगे।
Tuesday, July 6, 2010
भारतबंध
५ जुलाई को भारत बंध का आयोजन श्री शरद यादवके नेतृतव में सभी विरोधी दल की पार्टियों के सहयोग से सफल रहा। महंगाईसे त्रुस्त जनता ने पूरा सहयोग दिया पर फिर भी मुझे नहीं लगता की सर्कार पर इसका कोई असर होगा, कारन कोई भी राजनेता राजनीती को सेवा का शेत्र मानता ही नहीं है संवेदना ख़त्म होगईराजनीती वयवसाय बन गई है । सब को अपनी कुर्सी बचानेकी चिंता है , राजनीती में रहते हुए जो पाप किये हैं उनको छिपाने के लिए उनका राजनीती में रहना उनकी मजबूरी है।
Subscribe to:
Posts (Atom)